कंप्यूटर जनरेशन क्या है, और इसकी पीढियां

कंप्यूटर तकनीकी क्षेत्र में समय के साथ बहुत बदलाव आए हैं लेकिन ये देख कर आपके मन में भी ये जरुर आता होगा कि ये बदलाव और कंप्यूटर का विकास कैसे हुआ ? कंप्यूटर का इतिहास कई पीढ़ियों (Generations) में विभाजित किया गया है, जहां प्रत्येक पीढ़ी ने पहले से बेहतर तकनीक, अधिक शक्ति, तेज़ गति और अधिक उन्नत कार्यक्षमता पेश की। कंप्यूटर जनरेशन की यह यात्रा कंप्यूटर विज्ञान के विकास को स्पष्ट रूप से दिखाती है। इस लेख में हम कंप्यूटर जनरेशन के विभिन्न चरणों को विस्तार से समझेंगे, उनकी विशेषताएँ, प्रौद्योगिकी और प्रभाव पर चर्चा करेंगे।

कंप्यूटर जनरेशन (Computer Generation)

कंप्यूटर जनरेशन का अर्थ है, उस विशेष समय के दौरान उपयोग किए गए कंप्यूटरों की प्रौद्योगिकी, हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर की विशिष्टताएँ। प्रत्येक जनरेशन ने कंप्यूटर के आकार, गति, क्षमता और लागत में सुधार किया। इस प्रक्रिया के दौरान, कंप्यूटर के मुख्य घटकों में निरंतर सुधार हुआ, और यह तकनीकी दृष्टिकोण से पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली और सक्षम बने।

कंप्यूटर की पहली पीढ़ी (First Generation of Computers: 1940-1956)

कंप्यूटर की पहली पीढ़ी का समय 1940 से 1956 तक माना जाता है। इस दौर में कंप्यूटर तकनीक में कई बड़े परिवर्तन हुए, और कंप्यूटरों का पहला रूप विकसित हुआ। इस पीढ़ी के कंप्यूटर मुख्य रूप से वैक्यूम ट्यूब (Vacuum Tubes) पर आधारित थे, जो बड़े और भारी होते थे। हालांकि, इन कंप्यूटरों ने उस समय के गणना कार्यों को स्वचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन इनकी गति और क्षमता बहुत सीमित थी।

कंप्यूटर की पहली पीढ़ी की विशेषताएँ:

  1. पहली जनरेशन में कंप्यूटरों में वैक्यूम ट्यूब का इस्तेमाल किया गया था, जो आकार में बड़े और गर्मी उत्पन्न करने वाले होते थे।
  2. इन कंप्यूटरों का कार्यप्रणाली बाइनरी सिस्टम (0 और 1) पर आधारित थी।
  3. बहुत अधिक बिजली की खपत और धीमी कार्य गति के कारण ये कंप्यूटर बहुत महंगे और अस्थिर थे।
  4. इन कंप्यूटरों को प्रोग्राम करने के लिए मशीन लैंग्वेज का उपयोग किया जाता था।
  5. बड़ी मात्रा में स्थान की आवश्यकता होती थी और इन्हें बड़ी मशीनों में रखा जाता था।

प्रमुख उदाहरण:

  1. ENIAC (Electronic Numerical Integrator and Computer): यह पहला डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर था, जिसे गणना करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। यह लगभग 30 टन वजन का था।
  2. UNIVAC (Universal Automatic Computer): यह पहला व्यावसायिक कंप्यूटर था जिसे मापी जानकारी के लिए उपयोग किया जाता था। यह 1951 में पहली बार इस्तेमाल हुआ।

सीमाएँ:

  1. आकार और वजन: पहली जनरेशन के कंप्यूटर अत्यधिक बड़े और भारी थे। इनका आकार इतना विशाल था कि इन्हें किसी विशेष स्थान पर रखा जाता था।
  2. ऊर्जा की खपत: इन कंप्यूटरों को काम करने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती थी। वैक्यूम ट्यूब्स की गर्मी के कारण ये कंप्यूटर बहुत ज्यादा बिजली खींचते थे।
  3. विश्वसनीयता और स्थिरता: वैक्यूम ट्यूब्स बहुत जल्दी खराब हो जाते थे, जिससे कंप्यूटरों का स्थायित्व कम था।
  4. धीमी गति: इन कंप्यूटरों की गणना और प्रोसेसिंग की गति बहुत धीमी थी, जो केवल सीमित कार्यों को ही संपन्न कर सकती थी।

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कंप्यूटर की दूसरी पीढ़ी (Second Generation of Computers: 1956-1963)

कंप्यूटर की दूसरी पीढ़ी का समय 1956 से लेकर 1963 तक माना जाता है। पहली पीढ़ी के कंप्यूटरों की तुलना में दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटरों में कई महत्वपूर्ण तकनीकी सुधार किए गए थे, जो इन्हें अधिक तेज़, विश्वसनीय और किफायती बनाते थे। इस पीढ़ी के कंप्यूटरों में वैक्यूम ट्यूब की जगह ट्रांजिस्टर का उपयोग किया गया, जिससे कंप्यूटर के आकार में कमी आई, गति में वृद्धि हुई और ऊर्जा की खपत भी कम हुई। इसके अलावा, दूसरी पीढ़ी में प्रोग्रामिंग भाषाओं का भी विकास हुआ, जिससे कंप्यूटर को अधिक सरलता से प्रोग्राम किया जा सकता था।

कंप्यूटर की दूसरी पीढ़ी की विशेषताएँ:

  1. दूसरी जनरेशन में वैक्यूम ट्यूब की जगह ट्रांजिस्टर का उपयोग किया गया, जो आकार में छोटे, अधिक विश्वसनीय और कम गर्मी उत्पन्न करते थे।
  2. कंप्यूटर की कार्यक्षमता में सुधार हुआ, क्योंकि ट्रांजिस्टर से जुड़े सिस्टम तेज़, अधिक विश्वसनीय और ऊर्जा की बचत करने वाले थे।
  3. इस समय में FORTRAN और COBOL जैसी उच्च स्तरीय प्रोग्रामिंग भाषाओं का विकास हुआ।
  4. कंप्यूटरों का आकार और अधिक छोटा हो गया, जिससे उन्हें अधिक स्थानों पर उपयोग किया जा सका।
  5. इन कंप्यूटरों को बचत और व्यावसायिक कार्यों में प्रमुख रूप से प्रयोग किया जाने लगा।

प्रमुख उदाहरण:

  1. IBM 7090: यह एक प्रमुख ट्रांजिस्टर-आधारित कंप्यूटर था जो वैज्ञानिक और गणना संबंधी कार्यों के लिए उपयोग किया जाता था।
  2. IBM 1401: यह व्यावसायिक कार्यों के लिए डिजाइन किया गया था, जो डेटा प्रोसेसिंग के लिए इस्तेमाल होता था।

सीमाएँ:

  1. निर्भरता पर खतरा: जबकि ट्रांजिस्टर के मुकाबले वैक्यूम ट्यूब्स बेहतर थे, फिर भी इनकी विश्वसनीयता में कमी थी। कभी-कभी, ट्रांजिस्टर भी खराब हो जाते थे, जिससे सिस्टम को समय-समय पर मरम्मत की आवश्यकता पड़ती थी।
  2. प्रोग्रामिंग की जटिलता: दूसरी जनरेशन के कंप्यूटरों में मुख्य रूप से मशीन लैंग्वेज और असेंबली लैंग्वेज का इस्तेमाल किया जाता था, जो कि उपयोगकर्ताओं के लिए जटिल और कठिन थे।
  3. संगणना की सीमाएँ: ट्रांजिस्टर आधारित सिस्टम होने के बावजूद इन कंप्यूटरों की गणना क्षमता अब भी सीमित थी। बड़े गणनाओं और डेटा प्रोसेसिंग के लिए ये पर्याप्त नहीं थे।

कंप्यूटर की तीसरी पीढ़ी (Third Generation of Computers: 1964-1971)

कंप्यूटर की तीसरी पीढ़ी का समय 1964 से लेकर 1971 तक माना जाता है। तीसरी पीढ़ी के कंप्यूटरों में, ट्रांजिस्टर की जगह इंटीग्रेटेड सर्किट्स (ICs) का उपयोग किया गया, जो तकनीकी दृष्टि से एक बड़ा कदम था। इन कंप्यूटरों में पहले से कहीं अधिक गति, कम आकार, और अधिक विश्वसनीयता थी। इंटीग्रेटेड सर्किट्स (ICs) ने कंप्यूटर के डिज़ाइन को और अधिक प्रभावी बनाया, जिससे कंप्यूटर तेजी से छोटे होते गए और कम लागत में उपलब्ध हो सके।

कंप्यूटर की तीसरी पीढ़ी की विशेषताएँ:

  1. तीसरी जनरेशन में इंटीग्रेटेड सर्किट (ICs) का उपयोग हुआ, जिससे कंप्यूटर के आकार में और भी कमी आई और कार्यक्षमता में भारी वृद्धि हुई।
  2. ICs के उपयोग से बहुत सारे ट्रांजिस्टर एक ही चिप में समाहित हो गए, जिससे कंप्यूटर का आकार छोटा हुआ और लागत कम हुई।
  3. ऑपरेटिंग सिस्टम (OS) का विकास हुआ, जिससे कंप्यूटर को कई कार्यों को एक साथ संचालित करने की क्षमता मिली।
  4. कंप्यूटरों में अब मल्टीटास्किंग और मैमोरी मैनेजमेंट जैसी विशेषताएँ शामिल होने लगीं।

प्रमुख उदाहरण:

  1. IBM 360 Series: यह एक प्रसिद्ध इंटीग्रेटेड सर्किट आधारित कंप्यूटर था, जिसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर डेटा प्रोसेसिंग के लिए किया जाता था।
  2. PDP-8: यह मिनी कंप्यूटर था जिसे संचार, शिक्षा और अनुसंधान कार्यों के लिए डिजाइन किया गया था।

सीमाएँ:

  1. तकनीकी जटिलता: ICs के उपयोग से कंप्यूटर की क्षमता तो बढ़ी, लेकिन इन्हें बनाने और काम करने के लिए उन्नत तकनीकी कौशल की आवश्यकता थी। इन कंप्यूटरों को इस्तेमाल करने में तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती थी।
  2. सिस्टम का आकार: भले ही ICs से कंप्यूटर का आकार छोटा हुआ हो, फिर भी तीसरी जनरेशन के कंप्यूटरों का आकार बड़े होते थे और उनकी पहुंच सीमित थी।
  3. महंगा और सीमित उपयोग: इन कंप्यूटरों की लागत बहुत ज्यादा थी, और उनका उपयोग सीमित क्षेत्रों में ही किया जाता था, जैसे बड़े संगठनों और वैज्ञानिक संस्थानों में।

कंप्यूटर की चौथी पीढ़ी (Fourth Generation: 1971-1990)

कंप्यूटर की चौथी पीढ़ी का समय 1971 से 1990 तक माना जाता है। यह पीढ़ी माइक्रोप्रोसेसर के विकास के कारण महत्वपूर्ण मानी जाती है, जिसने कंप्यूटरों के आकार को बेहद छोटा कर दिया और उनकी कार्यक्षमता को बढ़ाया। चौथी पीढ़ी के कंप्यूटरों में न केवल हार्डवेयर में सुधार हुआ, बल्कि सॉफ़्टवेयर और इंटरफेस भी अत्यधिक विकसित हुए। इस पीढ़ी में पर्सनल कंप्यूटर (PC) का जन्म हुआ, जिससे कंप्यूटर आम लोगों के लिए सुलभ हो गए। साथ ही, ग्राफिकल यूज़र इंटरफेस (GUI) और वायरलेस नेटवर्किंग जैसी तकनीकों ने कंप्यूटरों को और अधिक सुविधाजनक और प्रभावशाली बना दिया।

कंप्यूटर की चौथी पीढ़ी की प्रमुख विशेषताएँ:

  1. चौथी जनरेशन में माइक्रोप्रोसेसर का आविष्कार हुआ, जिससे कंप्यूटर का आकार बहुत छोटा हो गया और उनकी कार्यक्षमता में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई।
  2. माइक्रोप्रोसेसर एक छोटा चिप होता है जो कंप्यूटर के सभी महत्वपूर्ण कार्यों को नियंत्रित करता है।
  3. इस दौर में व्यक्तिगत कंप्यूटर (PC) का विकास हुआ और कंप्यूटर आम लोगों तक पहुंचने लगे।
  4. ग्राफिक्स और यूज़र इंटरफेस (GUI) का विकास हुआ, जिससे कंप्यूटर का उपयोग और भी सरल और सहज हुआ।

प्रमुख उदाहरण:

  1. Apple II: यह पहला पर्सनल कंप्यूटर था, जिसे व्यापक रूप से उपयोग किया गया। यह कंप्यूटर ग्राफिक्स और वीडियो को सपोर्ट करता था।
  2. IBM PC: यह पहला कंप्यूटर था जिसे व्यक्तिगत उपयोग के लिए व्यावसायिक रूप से बेचा गया और दुनिया भर में लोकप्रिय हुआ।

सीमाएँ:

  1. मेमोरी की सीमाएँ: चौथी जनरेशन के कंप्यूटरों में माइक्रोप्रोसेसर के विकास के बावजूद, मेमोरी और प्रोसेसिंग की सीमाएँ बनी रही। इन कंप्यूटरों को अधिक जटिल कार्यों को सुलझाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं मिल पाए।
  2. सुरक्षा और नेटवर्किंग समस्याएँ: चौथी जनरेशन में कंप्यूटरों का नेटवर्किंग और इंटरनेट से जुड़ना शुरू हुआ, लेकिन सुरक्षा से संबंधित समस्याएँ उत्पन्न होने लगीं। हैकिंग और वायरस जैसी समस्याएँ उभरने लगीं
  3. यूज़र इंटरफेस की सीमाएँ: यद्यपि ग्राफिकल यूज़र इंटरफेस (GUI) की शुरुआत हुई, लेकिन यह तकनीक अभी भी शुरुआती अवस्था में थी और यूज़र इंटरफेस में बहुत सुधार की आवश्यकता थी।

कंप्यूटर की पाँचवीं पीढ़ी (Fifth Generation of Computers: 1990 – वर्तमान)

कंप्यूटर की पाँचवीं पीढ़ी का समय 1990 से लेकर वर्तमान तक माना जाता है। यह पीढ़ी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), नैचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (NLP), वाइड नेटवर्किंग, और पारलेल प्रोसेसिंग जैसी उन्नत तकनीकों के साथ जुड़ी हुई है। इस पीढ़ी में कंप्यूटर केवल डेटा प्रोसेसिंग तक सीमित नहीं रहे, बल्कि अब इनका उपयोग सोचने, सीखने और निर्णय लेने के लिए किया जाता है। इसने कंप्यूटर को स्मार्ट, स्वचालित, और उच्च-प्रदर्शन क्षमता से लैस बना दिया है। इसके अलावा, क्वांटम कंप्यूटिंग, नैचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग, और रोबोटिक्स जैसी नई प्रौद्योगिकियाँ इस पीढ़ी का हिस्सा हैं।

कंप्यूटर की पाँचवीं पीढ़ी की प्रमुख विशेषताएँ:

  1. पाँचवीं जनरेशन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग, क्वांटम कंप्यूटिंग, और सुपरकंप्यूटर जैसी नई तकनीकों का विकास हुआ।
  2. इन कंप्यूटरों में स्वचालन और स्वयं सीखने की क्षमता जैसी विशेषताएँ शामिल हैं, जिससे ये अधिक स्मार्ट और सक्षम बन गए हैं।
  3. यह पीढ़ी नैतिक निर्णय और स्वतंत्र सोच जैसी बौद्धिक गतिविधियों को भी अंजाम दे सकती है।
  4. कंप्यूटर नेटवर्किंग और इंटरनेट का तेजी से विस्तार हुआ, जिससे डेटा और सूचना का आदान-प्रदान अत्यधिक प्रभावी हो गया।
  5. सुपरकंप्यूटर बड़े पैमाने पर गणना, अनुसंधान और डेटा प्रोसेसिंग में उपयोग हो रहे हैं।

प्रमुख उदाहरण:

  1. IBM Blue Gene: यह एक सुपरकंप्यूटर है जो वैज्ञानिक अनुसंधान और बड़े पैमाने पर डेटा प्रोसेसिंग के लिए इस्तेमाल होता है।
  2. Google Quantum Computer: यह क्वांटम कंप्यूटिंग आधारित कंप्यूटर है, जो तेजी से और अधिक जटिल समस्याओं को हल करने में सक्षम है।

सीमाएँ:

  1. क्वांटम कंप्यूटिंग की सीमाएँ: क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी नई तकनीक ने कंप्यूटर की क्षमता को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है, लेकिन यह अभी भी अपने शुरुआती चरणों में है। इसे समझना और सही रूप में लागू करना चुनौतीपूर्ण है।
  2. ऊर्जा खपत: जबकि सुपरकंप्यूटर बहुत शक्तिशाली होते हैं, लेकिन उनकी ऊर्जा खपत बहुत अधिक होती है। ऐसे सिस्टम को बनाए रखना और संचालित करना महंगा और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
  3. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में नैतिक समस्याएँ: AI और मशीन लर्निंग में लगातार विकास हो रहा है, लेकिन इसके साथ-साथ इससे जुड़े नैतिक सवाल भी उठ रहे हैं, जैसे निर्णय लेने में मानव संलिप्तता और गोपनीयता की समस्याएँ।
  4. डेटा सुरक्षा और गोपनीयता: इंटरनेट और नेटवर्किंग के बढ़ते प्रभाव के साथ डेटा सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बन गई है। साइबर हमलों और डेटा चोरी से निपटने के लिए बहुत प्रभावी सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)-

प्रथम पीढ़ी का मुख्य कंप्यूटर कौन था?

First Generation का मुख्य कंप्यूटर ENIAC (Electronic Numerical Integrator and Computer) है जिसे 1945 में अमेरिका में जॉन प्रेसपेर एकर्ट और जेडी विलियम्स ने विकसित किया था। ENIAC पहले इलेक्ट्रॉनिक डिजिटल कंप्यूटर के रूप में माना जाता है, जो पूरी तरह से वैक्यूम ट्यूब्स पर आधारित था। यह कंप्यूटर गणना और डेटा प्रोसेसिंग के लिए उपयोग किया जाता था।

कंप्यूटर जनरेशन कितने प्रकार के होते हैं?

कंप्यूटर जनरेशन को पांच प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है-
1. पहली जनरेशन (1940-1956): वैक्यूम ट्यूब्स का उपयोग।
2. दूसरी जनरेशन (1956-1963): ट्रांजिस्टर का उपयोग।
3. तीसरी जनरेशन (1964-1971): आईसी (इंटीग्रेटेड सर्किट) का उपयोग।
4. चौथी जनरेशन (1971-वर्तमान): माइक्रोप्रोसेसर का उपयोग।
5. पाँचवीं जनरेशन (वर्तमान और भविष्य): आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और क्वांटम कंप्यूटिंग।

कंप्यूटर की लेटेस्ट जनरेशन कौन सी है?

पाँचवीं जनरेशन (Fifth Generation) कंप्यूटर की लेटेस्ट जनरेशन है जो 1971 से शुरु हुई है। इस जनरेशन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग और नैचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (NLP) जैसी तकनीकों को शामिल किया गया है। जिससे कंप्यूटर अधिक बुद्धिमान और सक्षम होते जा रहे हैं।

भारत का पहला सुपर कंप्यूटर कौन सा था?

भारत का पहला सुपर कंप्यूटर “परम 8000” था। इसे  सी-डैक (C-DAC) द्वारा विकसित किया गया था और यह 1991 में भारत में पेश किया गया था

प्रथम पीढ़ी के कंप्यूटर में क्या प्रयोग होता है?

प्रथम पीढ़ी के कंप्यूटरों में वैक्यूम ट्यूब (Vacuum Tubes)का प्रयोग होता था। ये ट्यूब बड़े होते थे, अधिक बिजली की खपत करते थे और जल्दी गर्म हो जाते थे। इसके अलावा, मशीन लैंग्वेज का उपयोग प्रोग्रामिंग के लिए किया जाता था।

निष्कर्ष

कंप्यूटर जनरेशन ने यह साबित किया है कि प्रौद्योगिकी में निरंतर सुधार और विकास की प्रक्रिया अनिवार्य है। प्रत्येक पीढ़ी ने कंप्यूटर की क्षमता और कार्यक्षमता में सुधार किया है, जिससे कंप्यूटर आज हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं भविष्य में कंप्यूटरों का आकार और भी छोटा होगा, उनकी कार्यक्षमता और भी तेज होगी, और वे अधिक स्वायत्त और बुद्धिमान होंगे। हालांकि, इसके साथ-साथ डेटा सुरक्षा, गोपनीयता और नैतिक मुद्दों जैसी नई चुनौतियाँ भी उभर सकती हैं।कुल मिलाकर, कंप्यूटर जनरेशन ने हमें एक ऐसा डिजिटल युग प्रदान किया है, जिसमें हम हर दिन नई संभावनाओं का सामना कर रहे हैं। यह यात्रा निरंतर जारी रहेगी, और कंप्यूटर तकनीक हमारे जीवन को और भी बेहतर, सरल और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देती रहेगी।

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