जब भी कंप्यूटर की पीढ़ियों की बात आती है, तो ज़्यादातर लोग second generation of computer पर आकर अटक जाते हैं। पहली पीढ़ी में vacuum tube थी, तीसरी पीढ़ी में IC आ गई — लेकिन बीच की यह दूसरी पीढ़ी अक्सर किताबों में दो-चार लाइन में निपटा दी जाती है।
यही वजह है कि students और beginners को यह साफ़ समझ नहीं आता कि दूसरी पीढ़ी असल में क्या थी और क्यों ज़रूरी थी।
अधिकांश ब्लॉग या तो बहुत ज़्यादा technical हो जाते हैं, या फिर सिर्फ exam-oriented जानकारी देते हैं। नतीजा यह होता है कि concept याद तो हो जाता है, लेकिन समझ develop नहीं होती। अगर आपके मन में भी यह सवाल है कि “दूसरी पीढ़ी में ऐसा क्या बदला जिसने कंप्यूटर को सच में उपयोगी बनाया?” तो यह लेख आपके लिए है।
इस ब्लॉग में आप दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर को बिल्कुल आसान, तार्किक और practical तरीके से समझेंगे — बिना रटे हुए points, बिना भारी शब्दों के। यहाँ focus सिर्फ इतिहास पर नहीं, बल्कि यह समझने पर होगा कि दूसरी पीढ़ी ने कंप्यूटर की दिशा कैसे बदल दी।
Second generation of Computer क्या है?
कंप्यूटर की दूसरी पीढ़ी को समझने के लिए पहले यह जानना ज़रूरी है कि यह पीढ़ी क्यों ज़रूरी थी। पहली पीढ़ी के कंप्यूटर vacuum tube पर आधारित थे। वे बहुत बड़े होते थे, ज़्यादा गर्मी पैदा करते थे, बार-बार खराब होते थे और उन्हें चलाने में बहुत ज़्यादा बिजली लगती थी। यानी कंप्यूटर थे तो सही, लेकिन रोज़मर्रा के काम के लिए बिल्कुल practical नहीं थे।
दूसरी पीढ़ी में यही सबसे बड़ा बदलाव हुआ कि vacuum tube की जगह transistor का इस्तेमाल शुरू किया गया। Transistor आकार में छोटे थे, कम गर्मी पैदा करते थे और ज़्यादा भरोसेमंद थे। इस एक बदलाव ने कंप्यूटर की पूरी working style बदल दी।
सीधे शब्दों में कहें तो
दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर वे कंप्यूटर थे जो
• पहले से छोटे थे
• पहले से तेज़ थे
• कम बिजली खर्च करते थे
• और लगातार काम कर सकते थे
यही वजह है कि इस पीढ़ी के बाद कंप्यूटर सिर्फ “experiment करने की मशीन” नहीं रहे, बल्कि actual काम करने के लिए इस्तेमाल होने लगे।
इस पीढ़ी का समय लगभग 1956 से 1963 के बीच माना जाता है। इसी दौरान कंप्यूटर का उपयोग पहली बार business calculations, payroll systems, government data और scientific research में होने लगा। यानी कंप्यूटर ने पहली बार इंसानों की असली समस्याएँ हल करनी शुरू कीं।
यह भी समझना ज़रूरी है कि दूसरी पीढ़ी को सिर्फ “transistor वाली पीढ़ी” कहना अधूरा सच है। असल में यह वह दौर था जब
• computer ज्यादा stable हुए
• errors कम होने लगे
• programming आसान होने लगी
• और computers पर भरोसा किया जाने लगा
अगर आप दूसरी पीढ़ी को समझ लेते हैं, तो आपको यह साफ़ दिखने लगता है कि modern computer की सोच यहीं से शुरू हुई थी। इसलिए यह सिर्फ एक history topic नहीं है, बल्कि computer evolution का सबसे important turning point है।
कंप्यूटर की दूसरी पीढ़ी की शुरुआत क्यों हुई?
कंप्यूटर की दूसरी पीढ़ी अचानक नहीं आई, बल्कि यह पहली पीढ़ी की गंभीर समस्याओं का सीधा जवाब थी। जब पहली पीढ़ी के कंप्यूटर इस्तेमाल में आए, तब वैज्ञानिकों और संस्थानों को जल्दी समझ आ गया कि ये मशीनें लंबे समय तक practical नहीं चल सकतीं।
पहली पीढ़ी के कंप्यूटर vacuum tube पर आधारित थे। Vacuum tube बहुत ज़्यादा गर्मी पैदा करती थीं, जल्दी खराब हो जाती थीं और लगातार maintenance माँगती थीं। कई बार तो एक छोटी-सी tube खराब होने पर पूरा सिस्टम बंद हो जाता था। इसका मतलब यह था कि कंप्यूटर पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता था।
दूसरी बड़ी समस्या थी size और cost। पहली पीढ़ी के कंप्यूटर पूरे कमरे जितने बड़े होते थे और उन्हें चलाने का खर्च इतना ज़्यादा था कि सिर्फ बड़े संस्थान या सरकार ही उन्हें afford कर सकती थी। आम business या research के लिए ये कंप्यूटर practically useless थे।
इन्हीं समस्याओं ने scientists को मजबूर किया कि वे कोई छोटी, सस्ती और भरोसेमंद तकनीक खोजें। इसी तलाश में transistor सामने आया। Transistor ने वही काम किया जो vacuum tube करती थी, लेकिन
• बहुत कम जगह में
• कम बिजली के साथ
• और ज़्यादा reliability के साथ
यही कारण है कि दूसरी पीढ़ी की शुरुआत हुई। इसका उद्देश्य सिर्फ नई technology लाना नहीं था, बल्कि कंप्यूटर को रोज़मर्रा के काम के लायक बनाना था। दूसरी पीढ़ी ने कंप्यूटर को research lab से निकालकर business, government और practical world तक पहुँचाया।
यहीं से कंप्यूटर का विकास “सैद्धांतिक मशीन” से बदलकर problem-solving tool बनना शुरू हुआ।
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दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर में कौन-सी नई तकनीक आई?
दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर में जो सबसे बड़ा और निर्णायक बदलाव हुआ, वह था transistor का इस्तेमाल। यही तकनीक इस पूरी पीढ़ी की पहचान बनी। Transistor ने न सिर्फ hardware को बदला, बल्कि कंप्यूटर की सोच और उपयोग दोनों को नई दिशा दी।
पहली पीढ़ी में vacuum tube का इस्तेमाल होता था, जो आकार में बड़ी, नाज़ुक और बहुत ज़्यादा गर्मी पैदा करने वाली होती थीं। इसके उलट transistor छोटे, मजबूत और ज़्यादा stable थे। इसका सीधा असर कंप्यूटर की performance पर पड़ा।
Transistor के आने से कंप्यूटर
• आकार में छोटे हो गए
• कम बिजली खर्च करने लगे
• जल्दी खराब नहीं होते थे
• और लगातार लंबे समय तक काम कर सकते थे
यह सिर्फ hardware का बदलाव नहीं था। इस नई तकनीक की वजह से कंप्यूटर को बेहतर तरीके से design किया जा सका। Circuits पहले से ज़्यादा compact बने, जिससे processing तेज़ हुई और errors कम होने लगे।
एक और महत्वपूर्ण बदलाव यह था कि transistor की वजह से heat control बेहतर हो गया। पहली पीढ़ी में overheating एक बड़ी समस्या थी, लेकिन दूसरी पीढ़ी में यह काफी हद तक कम हो गई। इससे कंप्यूटर को बंद किए बिना लंबे समय तक चलाना संभव हुआ।
सरल शब्दों में कहें तो transistor ने कंप्यूटर को “भारी और unreliable मशीन” से बदलकर एक practical और भरोसेमंद सिस्टम बना दिया।
इसी तकनीकी बदलाव के कारण दूसरी पीढ़ी को कंप्यूटर के विकास का real turning point माना जाता है।
ट्रांजिस्टर क्या है और यह इतना जरूरी क्यों था?
ट्रांजिस्टर एक छोटा सा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण होता है, जो बिजली के प्रवाह को नियंत्रित करने का काम करता है। कंप्यूटर में इसका उपयोग signal को बढ़ाने और सही समय पर on–off करने के लिए किया जाता है। आसान भाषा में कहें तो ट्रांजिस्टर वही काम करता है जो पहले vacuum tube करती थी, लेकिन कहीं ज़्यादा बेहतर तरीके से।
पहली पीढ़ी में इस्तेमाल होने वाली vacuum tube बहुत बड़ी होती थीं और उन्हें सही तरह काम करने के लिए ज़्यादा बिजली और ज़्यादा cooling चाहिए होती थी। जैसे ही कोई tube खराब होती, पूरा कंप्यूटर रुक जाता। यही वजह थी कि पहली पीढ़ी के कंप्यूटर भरोसेमंद नहीं माने जाते थे।
ट्रांजिस्टर ने इस समस्या को सीधे हल किया। यह आकार में छोटा था, कम गर्मी पैदा करता था और जल्दी खराब नहीं होता था। इससे कंप्यूटर ज्यादा stable हो गए और उन्हें लंबे समय तक बिना रुके चलाया जा सका।
इसे एक आसान उदाहरण से समझिए।
Vacuum tube को आप पुराने बल्ब की तरह समझ सकते हैं, जो ज़्यादा गर्म होता है और जल्दी फ्यूज़ हो जाता है। वहीं transistor आधुनिक LED की तरह है, जो कम बिजली में ज़्यादा अच्छा काम करता है और लंबा चलता है।
इसी कारण transistor सिर्फ एक component नहीं था, बल्कि कंप्यूटर की दिशा बदलने वाली खोज थी। इसके बिना न दूसरी पीढ़ी संभव थी और न ही आज के आधुनिक कंप्यूटर।
कंप्यूटर की दूसरी पीढ़ी कैसे काम करती थी?
दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर का काम करने का तरीका पहली पीढ़ी जैसा ही था, लेकिन तकनीक बेहतर होने की वजह से प्रक्रिया ज्यादा smooth और reliable हो गई थी। इन कंप्यूटरों में input, processing और output का एक तय flow होता था, जिसे व्यवस्थित तरीके से follow किया जाता था।
- सबसे पहले input के रूप में data कंप्यूटर में डाला जाता था। उस समय keyboard जैसा input device आम नहीं था, इसलिए अधिकतर input punch card या magnetic tape के ज़रिये दिया जाता था। इसमें पहले से तैयार instructions और data होते थे।
- इसके बाद processing का काम शुरू होता था। CPU के अंदर transistor आधारित circuits data को process करते थे। चूँकि transistor तेज़ और stable थे, इसलिए calculations पहले से कहीं जल्दी और कम error के साथ पूरी होती थीं।
- Processing के दौरान instructions memory से ली जाती थीं और step-by-step execute की जाती थीं। इस समय batch processing का concept इस्तेमाल होता था, जिसमें कई jobs को एक साथ group करके कंप्यूटर को दिया जाता था। कंप्यूटर उन सभी jobs को क्रम से पूरा करता था।
- आख़िर में output मिलता था, जो ज़्यादातर printout या magnetic tape के रूप में होता था। स्क्रीन पर result देखने की सुविधा आम नहीं थी, इसलिए output physical form में लिया जाता था।
सरल शब्दों में कहें तो Second Generation Computer
• पहले input लेते थे
• फिर उसे process करते थे
• और अंत में result देते थे
लेकिन फर्क यह था कि अब यह पूरा काम तेज़, भरोसेमंद और लगातार हो सकता था। यही कारण है कि दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर पहली बार real-world कामों के लिए उपयोगी बने।
Input (पंच कार्ड / मैग्नेटिक टेप)
↓
Data और Instructions Memory में Store होते हैं
↓
CPU (Transistor आधारित) Instructions को पढ़ता है
↓
Step-by-Step Processing होती है
↓
Calculations और Logical Decisions पूरे होते हैं
↓
Result तैयार होता है
↓
Output (Printout / Magnetic Tape)
दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर के मुख्य components
दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर के components पहली पीढ़ी जैसे ही लगते हैं, लेकिन अंदर की तकनीक पूरी तरह बदल चुकी थी। इन्हीं बदलावों की वजह से कंप्यूटर ज्यादा तेज़ और भरोसेमंद बने।
- CPU (Central Processing Unit)
CPU के अंदर vacuum tube की जगह transistor लगाए गए थे। इससे processing speed बढ़ी और heat कम हुई। CPU अब instructions को ज़्यादा सही और लगातार execute कर सकता था। - Memory (मुख्य मेमोरी)
दूसरी पीढ़ी में magnetic core memory का उपयोग हुआ। यह पहली पीढ़ी की memory से ज्यादा fast और stable थी। Program और data को अस्थायी रूप से store करने के लिए यही memory इस्तेमाल होती थी। - Input Devices
Input के लिए punch card और magnetic tape का उपयोग होता था। Users पहले से instructions तैयार करते थे और फिर उन्हें batch में कंप्यूटर को देते थे। - Output Devices
Output ज़्यादातर printout के रूप में मिलता था। कई बार processed data को magnetic tape में भी store किया जाता था ताकि आगे उपयोग हो सके। - Storage Devices
Long-term storage के लिए magnetic tape और शुरुआती magnetic disks का इस्तेमाल हुआ। इससे data को बार-बार reuse करना संभव हुआ।
सरल शब्दों में कहें तो दूसरी पीढ़ी के components ने मिलकर कंप्यूटर को
तेज़, कम error वाला और practical system बना दिया।
दूसरी पीढ़ी में कौन-सी programming languages इस्तेमाल हुईं?
दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर में programming का तरीका पहली पीढ़ी से काफी अलग हो गया था। पहले programmers को मशीन की भाषा में सीधे instructions लिखने पड़ते थे, जो समझना और लिखना दोनों ही मुश्किल था। दूसरी पीढ़ी में यह समस्या काफी हद तक हल हुई।
- Machine Language की सीमा
पहली पीढ़ी में programming सिर्फ 0 और 1 पर आधारित machine language में होती थी। इसमें छोटी-सी गलती भी पूरा program खराब कर देती थी। - Assembly Language का उपयोग
दूसरी पीढ़ी में assembly language का इस्तेमाल शुरू हुआ। इसमें 0 और 1 की जगह छोटे-छोटे शब्द और symbols होते थे, जिससे instructions लिखना आसान हुआ। - High-Level Languages की शुरुआत
इसी दौर में शुरुआती high-level languages सामने आईं, जैसे FORTRAN और COBOL। इन भाषाओं ने programming को इंसानों के लिए ज्यादा समझने योग्य बना दिया। - Programming क्यों आसान हुई?
अब programmers को hardware के हर छोटे detail की चिंता नहीं करनी पड़ती थी। वे problem पर ज्यादा और machine पर कम ध्यान दे सकते थे।
इस बदलाव की वजह से कंप्यूटर का उपयोग सिर्फ scientists तक सीमित नहीं रहा, बल्कि business और government sectors में भी बढ़ने लगा।
कंप्यूटर की दूसरी पीढ़ी के प्रमुख उदाहरण
दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर को सही तरह समझने के लिए उनके वास्तविक उदाहरण देखना बहुत ज़रूरी है। इससे यह साफ़ हो जाता है कि ये मशीनें सिर्फ theory नहीं थीं, बल्कि असल दुनिया में बड़े स्तर पर इस्तेमाल हो रही थीं।
- IBM 1401: यह दूसरी पीढ़ी का सबसे लोकप्रिय कंप्यूटर माना जाता है। इसका उपयोग business data processing, payroll और accounting जैसे कामों में हुआ। इसकी reliability की वजह से कई कंपनियों ने इसे अपनाया।
- IBM 7090: यह एक high-performance scientific computer था। इसका इस्तेमाल space research, scientific calculations और complex data processing में किया गया।
- UNIVAC Systems (Second Generation): UNIVAC के transistor-based versions का उपयोग government departments और large data handling के लिए किया गया। इससे बड़े पैमाने पर records maintain करना आसान हुआ।
इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर ने पहली बार real-world problems को practical तरीके से solve करना शुरू किया।
दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर का वास्तविक उपयोग कहाँ हुआ?
दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर का सबसे बड़ा योगदान यह था कि कंप्यूटर पहली बार थ्योरी से निकलकर प्रैक्टिकल ज़िंदगी का हिस्सा बने। transistor की वजह से ये मशीनें लगातार काम कर सकती थीं, इसलिए संस्थानों ने इन पर भरोसा करना शुरू किया।
Business और Accounting में उपयोग
कंपनियों के लिए सबसे बड़ी समस्या थी बड़े पैमाने पर data को संभालना। दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर से payroll तैयार करना, कर्मचारियों की salary calculate करना और monthly accounts बनाना आसान हो गया। जो काम पहले कई दिनों में होता था, वह अब कुछ घंटों में पूरा होने लगा।
Government और प्रशासनिक कार्य
सरकारी विभागों में जनगणना, tax records और population data को manage करना बहुत मुश्किल था। दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर ने इन कामों को तेज़ और व्यवस्थित बना दिया। इससे decision-making में भी सुधार हुआ।
Scientific और Research क्षेत्र
इस समय scientific calculations बहुत complex होती थीं। दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर ने physics, chemistry और space-related research में बड़ी भूमिका निभाई। बड़े-बड़े mathematical problems अब कम समय में solve होने लगे।
Education और Skill Development
Universities में students को programming सिखाने के लिए इन कंप्यूटरों का इस्तेमाल हुआ। यहीं से computer science एक अलग subject के रूप में develop होने लगा।
पहली और दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर में वास्तविक अंतर
| बिंदु | First Generation of Computer | Second Generation of Computer |
| उपयोग की तकनीक | Vacuum Tube का इस्तेमाल होता था, जो बड़े और नाज़ुक होते थे | Transistor का उपयोग हुआ, जो छोटे और ज़्यादा टिकाऊ थे |
| आकार | पूरे कमरे जितने बड़े सिस्टम | आकार में छोटे और compact design |
| बिजली की खपत | बहुत ज़्यादा बिजली की ज़रूरत | कम बिजली में बेहतर काम |
| गर्मी की समस्या | अत्यधिक गर्मी पैदा होती थी | Heat कम होने से सिस्टम stable |
| विश्वसनीयता | बार-बार खराब होने की समस्या | लगातार लंबे समय तक काम करने योग्य |
| गति | Calculations धीमी होती थीं | Processing पहले से तेज़ |
| Programming | केवल Machine Language में coding | Assembly और शुरुआती High-Level Languages |
| उपयोग का क्षेत्र | सीमित, मुख्यतः research | Business, government और education |
| रखरखाव | Maintenance कठिन और महँगा | Maintenance आसान और सस्ता |
कंप्यूटर की दूसरी पीढ़ी के फायदे और नुकसान
दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर को सिर्फ “transistor वाला कंप्यूटर” कहना अधूरी जानकारी है। असल में इस पीढ़ी ने कंप्यूटर को असली दुनिया के कामों के लायक बनाया। लेकिन इसके साथ कुछ सीमाएँ भी थीं, जिन्हें समझना ज़रूरी है।
दूसरी पीढ़ी के फायदे
- दूसरी पीढ़ी का सबसे बड़ा फायदा यह था कि कंप्यूटर पर भरोसा किया जाने लगा। पहली पीढ़ी में vacuum tube जल्दी खराब हो जाती थीं, जिससे सिस्टम बार-बार बंद हो जाता था। Transistor आने से यह समस्या काफी हद तक खत्म हो गई। अब कंप्यूटर लंबे समय तक लगातार काम कर सकते थे, जो business और government के लिए बहुत ज़रूरी था।
- इस पीढ़ी में processing speed में भी बड़ा सुधार हुआ। Calculations और data processing पहले की तुलना में तेज़ होने लगे। इसका मतलब यह था कि कंपनियाँ बड़े पैमाने पर data handle कर सकती थीं, जो पहले लगभग असंभव था।
- बिजली की खपत और गर्मी दोनों में कमी आई। पहली पीढ़ी के कंप्यूटर बहुत ज़्यादा बिजली लेते थे और अत्यधिक गर्म हो जाते थे। दूसरी पीढ़ी में transistor की वजह से heat कम पैदा हुई, जिससे system stable रहा और maintenance cost भी घटी।
- Programming के क्षेत्र में यह पीढ़ी एक बड़ा बदलाव लेकर आई। Assembly language और शुरुआती high-level languages की वजह से programming आसान हुई। अब programmers को हर छोटी बात hardware के हिसाब से नहीं लिखनी पड़ती थी। इससे software development तेज़ हुआ और errors भी कम हुए।
- एक और महत्वपूर्ण फायदा यह था कि कंप्यूटर का उपयोग सिर्फ scientists तक सीमित नहीं रहा। Business, banking, government offices और universities में कंप्यूटर का practical use शुरू हुआ। यही वह समय था जब कंप्यूटर को “काम करने वाली मशीन” के रूप में देखा जाने लगा।
दूसरी पीढ़ी के नुकसान
- इतने सुधारों के बावजूद दूसरी पीढ़ी पूरी तरह perfect नहीं थी। कंप्यूटर पहले से छोटे जरूर हुए, लेकिन फिर भी उनका आकार बड़ा था। इन्हें रखने के लिए खास कमरे और infrastructure की जरूरत पड़ती थी।
- Heat की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। कई सिस्टम को अब भी air-conditioning की आवश्यकता होती थी, जिससे खर्च बढ़ता था।
- Input और output के तरीके भी आसान नहीं थे। Punch card और magnetic tape जैसे माध्यम आम users के लिए जटिल थे। Computer को operate करने के लिए trained staff की जरूरत पड़ती थी।
- लागत भी एक बड़ी समस्या थी। दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर आम लोगों या छोटे व्यवसायों की पहुँच से बाहर थे। केवल बड़े संस्थान ही इन्हें afford कर सकते थे।
- इन सभी फायदे और सीमाओं को देखकर यह साफ़ हो जाता है कि दूसरी पीढ़ी
कंप्यूटर के विकास में एक मजबूत लेकिन अधूरा कदम थी। इसी अधूरेपन ने तीसरी पीढ़ी के कंप्यूटर के लिए रास्ता तैयार किया।
लोग दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर को लेकर कौन-सी गलतियाँ करते हैं?
- दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर को समझते समय ज़्यादातर लोग कुछ आम गलतियाँ कर बैठते हैं। यही गलतियाँ concepts को कमजोर बना देती हैं और आगे की पीढ़ियों को समझना मुश्किल कर देती हैं।
- सबसे बड़ी गलती यह होती है कि लोग दूसरी पीढ़ी को सिर्फ एक historical topic मान लेते हैं। वे सोचते हैं कि यह सिर्फ exam में आने वाली जानकारी है, जबकि असल में दूसरी पीढ़ी ने modern computing की नींव रखी थी।
- एक और आम गलती यह है कि transistor को बहुत छोटा बदलाव समझ लिया जाता है। कई लोग मानते हैं कि vacuum tube से transistor पर जाना सिर्फ size कम करने का मामला था। जबकि सच्चाई यह है कि transistor ने reliability, speed और energy efficiency — तीनों को पूरी तरह बदल दिया।
- कई beginners यह भी मान लेते हैं कि दूसरी पीढ़ी में programming में कोई खास बदलाव नहीं हुआ। जबकि इसी पीढ़ी में assembly language और शुरुआती high-level languages आईं, जिन्होंने software development को संभव बनाया।
- कुछ लोग दूसरी पीढ़ी को पहली और तीसरी पीढ़ी के बीच का “fill-up chapter” समझते हैं। इस सोच की वजह से वे इसके concepts को ठीक से नहीं पढ़ते और बाद में computer evolution समझने में दिक्कत होती है।
दूसरी पीढ़ी को समझने के लिए Pro Tips & Insights
- अगर आप दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर को सच में समझना चाहते हैं, न कि सिर्फ याद करना, तो कुछ practical बातों पर ध्यान देना ज़रूरी है। ये वही बातें हैं जो अक्सर किताबों या छोटे blogs में नहीं मिलतीं।
- सबसे पहले, दूसरी पीढ़ी को पहली पीढ़ी से तुलना करके समझें। जब आप यह देखते हैं कि vacuum tube ने क्या problems पैदा की थीं और transistor ने उन्हें कैसे हल किया, तो पूरा concept अपने-आप clear हो जाता है।
- दूसरी बात, transistor को सिर्फ एक component न मानें। इसे एक turning point की तरह देखें। Transistor ने computer को तेज़ ही नहीं बनाया, बल्कि भरोसेमंद बनाया — और भरोसे के बिना कोई भी technology आगे नहीं बढ़ती।
- Programming के angle से सोचें। दूसरी पीढ़ी में coding इंसानों के लिए थोड़ी आसान हुई। यही वजह है कि इस दौर के बाद software development तेज़ी से बढ़ा। अगर आप इसे समझ लेते हैं, तो modern programming की सोच भी साफ़ हो जाती है।
- Exam preparation के लिए सिर्फ years और names याद न करें। यह समझने की कोशिश करें कि
“किस problem को solve करने के लिए दूसरी पीढ़ी लाई गई थी?”
यह सवाल खुद-ब-खुद आपको सही answer तक पहुँचा देता है। - एक और महत्वपूर्ण insight यह है कि दूसरी पीढ़ी ने computer को cost vs benefit के हिसाब से usable बनाया। यानी अब computer पर खर्च करने का मतलब बनता था, क्योंकि वह लगातार काम कर सकता था।
Conclusion
कंप्यूटर की दूसरी पीढ़ी को समझना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यहीं से कंप्यूटर ने सच में काम करना शुरू किया। पहली पीढ़ी ने यह दिखाया कि कंप्यूटर संभव हैं, लेकिन दूसरी पीढ़ी ने यह साबित किया कि कंप्यूटर भरोसेमंद और उपयोगी भी हो सकते हैं।
Transistor के आने से कंप्यूटर छोटे, तेज़ और ज़्यादा stable बने। Programming आसान हुई, errors कम हुए और कंप्यूटर research से निकलकर business, government और education तक पहुँचे। यही वजह है कि दूसरी पीढ़ी को सिर्फ एक historical phase नहीं, बल्कि modern computing की असली नींव माना जाता है।
अगर आप दूसरी पीढ़ी को सिर्फ exam के लिए पढ़ते हैं, तो शायद इसका महत्व समझ न आए। लेकिन जब आप इसे problem–solution के रूप में देखते हैं, तो आपको साफ़ दिखता है कि आज के advanced computers की सोच यहीं से शुरू हुई थी।
अगर transistor जैसी छोटी-सी दिखने वाली technology इतना बड़ा बदलाव ला सकती है, तो आने वाली पीढ़ियों में कौन-सा बदलाव सबसे ज़्यादा असर डालता होगा?
FAQs
कंप्यूटर की दूसरी पीढ़ी कब शुरू हुई थी?
कंप्यूटर की दूसरी पीढ़ी लगभग 1956 में शुरू हुई और 1963 तक चली। इस दौरान vacuum tube की जगह transistor का उपयोग शुरू हुआ।
दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर में transistor क्यों ज़रूरी था?
Transistor छोटा, भरोसेमंद और कम गर्मी पैदा करने वाला था। इसने कंप्यूटर को तेज़, stable और practical बनाया।
क्या दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर आज के कंप्यूटर से जुड़े हैं?
हाँ, दूसरी पीढ़ी ने reliability और programming की जो नींव रखी, उसी पर आज के modern computer बने हैं।
दूसरी पीढ़ी में कौन-सी programming languages इस्तेमाल हुईं?
Assembly language और शुरुआती high-level languages जैसे FORTRAN और COBOL का उपयोग हुआ।
Exam के लिए दूसरी पीढ़ी को कैसे याद रखें?
Vacuum tube की problems और transistor के solutions को जोड़कर पढ़ें। इससे concept अपने-आप याद रहेगा।